भारत में शिक्षा का बुरा हाल है. बाकि कमी को शिक्षा का बाजारीकरण ने पूरा कर दिया है. पहले लोग कहते थे की पैसे से सबकुछ खरीद सकते हो पर 'ज्ञान' नहीं. पर आज के दौर में सब संभव है. उदहारण के लिए आज कोई भी कपिटेशन शुल्क देकर डॉक्टर, इंजिनियर बन सकता है. या अपने लायक कोई शिक्षा प्राप्त कर सकता है खाली जेब में पैसा होना चाहिए।भारत में चूँकि "शिक्षा का बाजारीकरण" अभी नया नया ही हुआ है अतः लोगों को इस से जुड़े हुए "उपभोक्ता अधिकार" की बात समझ भी कम है. वर्तमान समय में एकतरफ जब शिक्षा एक कारोबार का रूप ले चूका है फिर भी लोग इन शिक्षा के कारोबारियों को "गुरु" की वास्तविक पदवी दे रखे हैं जो की सरासर गलत है. आज के ये शिक्षा कारोबारी सिर्फ एक कारोबारी हैं जो की शिक्षा बेचते हैं और आप पैसे देकर अपने या अपने बच्चों के लिए खरीदते है.
आज से 15 साल पहले की बात है एक अनपढ़ दादी के पोते का नामांकन गाँव में ही खुले एक निजी स्कूल में करवाया गया. उस स्कूल को गाँव के ही शिक्षित पर बेरोजगार युवक चलाते थे. बच्चा पहली क्लास में था और छः महीने तक उसे स्वर, वयंजन(अ, आ, इ..., क, ख, ग...) आदि का ज्ञान नहीं हुआ. खास बात यह हुई की घर में पैसे की कमी के चलते इन छः महीनो में शायद अंतिम दो महीने का फी(शुल्क) भी जमा नहीं हो पाया था. एक दिन उस बच्चे को स्कूल से यह कह कर निकाला गया की पहले का 'फी' जमा करो तब पढने आओ.
अब दादी ने अपने पोते को साथ लिया और पहुँच गई स्कूल. दादी ने प्रधानाध्यापक से बच्चे के नाम काटने का कारन पूछा. उत्तर में 'फी' जमा करवाने की सलाह मिली. अब दादी ने गाँव के खास लोगों को बुलाया और कहा की गाँव के सभी प्रमुखगन ध्यान से सुनकर बिचार करें की जब मेरा पोता को यह मास्टर लोग छः महीने तक क, ख, ग... नहीं सिखा पाए तो ये पैसे किस बात के मांगते हैं? दादी के इस यक्ष प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था.
अब मैं सोचता हूँ की बरसों पहले जब अनपढ़ दादी शिक्षा का बाजारी रूप और इस से जुड़े "उपभोक्ता अधिकार" के लिए लड़ सकती है तो क्यों नहीं सन् 2009 मे "शिक्षा-उपभोक्ता" अपनी गाढ़ी कमाई के एक-एक पैसे का मोल समझें और हिसाब लें इन शिक्षा कारोबारियों और माफियाओं से जो की बड़े बड़े प्रचार माध्यमों के जरिये देश के लाखों-करोरो सीधे-सादे छात्रों और उनके अभिभावकों को बड़े बड़े सपने दिखाते हैं और फीस के नाम पर मोटि रकम वसूल लेते हैं और साथ ही शिक्षाकार्य के नाम पर सस्ती दर पर सरकारी जमीन पर भी कब्जा जमा लेते हैं.
स्वतंत्रता के बाद के भारतीय राजनीतिज्ञ "गलाकाट" राजनीती में विश्वास करते हैं अतः "सत्ता" और "शक्ति" को बरक़रार रखने के लिए कोई भी हद पार करने से ये कतराते नहीं हैं I