Saturday, August 1, 2009

जागो ग्राहक जागो

भारत में शिक्षा का बुरा हाल है. बाकि कमी को शिक्षा का बाजारीकरण ने पूरा कर दिया है. पहले लोग कहते थे की पैसे से सबकुछ खरीद सकते हो पर 'ज्ञान' नहीं. पर आज के दौर में सब संभव है. उदहारण के लिए आज कोई भी कपिटेशन शुल्क देकर डॉक्टर, इंजिनियर बन सकता है. या अपने लायक कोई शिक्षा प्राप्त कर सकता है खाली जेब में पैसा होना चाहिए।

भारत में चूँकि "शिक्षा का बाजारीकरण" अभी नया नया ही हुआ है अतः लोगों को इस से जुड़े हुए "उपभोक्ता अधिकार" की बात समझ भी कम है. वर्तमान समय में एकतरफ जब शिक्षा एक कारोबार का रूप ले चूका है फिर भी लोग इन शिक्षा के कारोबारियों को "गुरु" की वास्तविक पदवी दे रखे हैं जो की सरासर गलत है. आज के ये शिक्षा कारोबारी सिर्फ एक कारोबारी हैं जो की शिक्षा बेचते हैं और आप पैसे देकर अपने या अपने बच्चों के लिए खरीदते है.

आज से 15 साल पहले की बात है  एक  अनपढ़  दादी के पोते का नामांकन गाँव में ही खुले एक निजी स्कूल में करवाया गया. उस स्कूल को गाँव के ही शिक्षित पर बेरोजगार युवक चलाते थे. बच्चा पहली क्लास में था और छः महीने तक उसे स्वर, वयंजन(अ, आ, इ..., क, ख, ग...) आदि का ज्ञान नहीं हुआ. खास बात यह हुई की घर में पैसे की कमी के चलते इन छः महीनो में शायद अंतिम दो महीने का फी(शुल्क) भी जमा नहीं हो पाया था. एक दिन उस बच्चे को स्कूल से यह कह कर निकाला गया की पहले का 'फी' जमा करो तब पढने आओ.

अब दादी ने अपने पोते को साथ लिया और पहुँच गई स्कूल. दादी ने प्रधानाध्यापक से बच्चे के नाम काटने का कारन पूछा. उत्तर में 'फी' जमा करवाने की सलाह मिली. अब दादी ने गाँव के खास लोगों को बुलाया और कहा की गाँव के सभी प्रमुखगन ध्यान से सुनकर बिचार करें की जब मेरा पोता को यह मास्टर लोग छः महीने तक क, ख, ग... नहीं सिखा पाए तो ये पैसे किस बात के मांगते हैं? दादी के इस यक्ष प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था.

अब मैं सोचता हूँ की बरसों पहले जब अनपढ़ दादी शिक्षा का बाजारी रूप और इस से जुड़े "उपभोक्ता अधिकार" के लिए लड़ सकती है तो क्यों नहीं सन् 2009 मे "शिक्षा-उपभोक्ता" अपनी गाढ़ी कमाई के एक-एक पैसे का मोल समझें और हिसाब लें इन शिक्षा कारोबारियों और माफियाओं से जो की बड़े बड़े प्रचार माध्यमों के जरिये देश के लाखों-करोरो सीधे-सादे छात्रों और उनके अभिभावकों को बड़े बड़े सपने दिखाते हैं और फीस के नाम पर मोटि रकम वसूल लेते हैं और साथ ही शिक्षाकार्य के नाम पर सस्ती दर पर सरकारी जमीन पर भी कब्जा जमा लेते हैं.

Sunday, October 5, 2008

राजधर्म जाए पर सत्ता न जाए

स्वतंत्रता के बाद के भारतीय राजनीतिज्ञ "गलाकाट" राजनीती में विश्वास करते हैं अतः "सत्ता" और "शक्ति" को बरक़रार रखने के लिए कोई भी हद पार करने से ये कतराते नहीं हैं I

वैसे तो उपरोक्त पंक्तियों को सिद्ध करने के लिए सैकड़ो बड़े और शायद कई हज़ार छोटे उदहारण दिए जा सकते हैं पर हल-फिलहाल में उड़ीसा के कंधमाल जिले में ईसाईयों के खिलाफ जारी हिंसा और "नविन पटनायक" सरीखे मुख्यमंत्री की अक्रमन्यता या कहें मजबूरी में "ध्रितराष्ट्र" बनने के विवशता काफी सटीक उदहारण साबित हो सकता हैI

हमारे राजनेता एक बार "सत्तासीन" होने के बाद उससे आसानी से अलग होना नहीं चाहते और सत्तामोह में अपनी सारी नीतिगत ज्ञान को ताक पर रख देते हैंI

नवीन पटनायक देल्ही विश्वविद्यालय के अन्तर्गर्त और ईसाईयों के द्वारा संचालित "संत स्टीफन कॉलेज" से स्नातक हैं और वर्त्तमान में "संघ" प्रेरित "भारतीय जनता पार्टी" के सहयोग से उड़ीसा के सत्तासीन मुख्यमंत्री हैं पर इसबार ईसाईयों के खिलाफ होने वाली बर्बरता जब अपनी सारी सीमाएं लाँघ गईं है "नवीन" सरकार इस हिंसा को काबू करने में पुरी तरह विफल साबित हुई है I

उड़ीसा में वर्त्तमान हिंसा के पीछे शायद कई जमीनी हकीक़त होंगी पर एक बात साफ़ है की नवीन पटनायक अपनी "हिंदूवादी सहयोगी पार्टी" को नाखुश करने का हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है जिसका परिणाम है की केन्द्र से पर्याप्त मात्रा में "अर्धसैनिक बल" मिलने के बावजूद हिंसा दमन हेतु कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाए हैंI

हमारे देश में पार्टी केवल "सत्तासीन" होने की राजनीती करती हैI इनके मन में किंचित मात्र भी व्यापक विकाश और सर्वजनकल्याण का चाहत नहीं होताI हर पार्टी अपने विशेष वर्ग का समर्थन पाने के लिए " कुछ भी करने से नहीं हिचकता I विगत कुछ वर्षों में केन्द्र और राज्यों की सरकारें अपनी सहयोगी दलों के समर्थन वाली "वैशाखी" के सहारे ही टिक पाई है और नेतृत्वा वाली पार्टी और उसके नेता मजबूर होते हैं सहयोगी दलों के इशारे पर नाचने के लिएI

नहीं तो आज के आधुनिक युग में "संत स्टीफन कॉलेज" के स्नातक और " बीजू पटनायक" जैसे उड़ीसा के महान नेता के पुत्र के नेतृत्वा वाली सरकार को 38 दिन उन आरोपियों को गिरफ्तार करने में जाया नहीं करना पड़ता जिन पर एक 29 वर्षीय कैथोलिक नर्स को नंगा परेड करने पर विवस करने और बलात्कार करने का संगीन आरोप लगे हैंI

इस मामले में केन्द्र की संप्रग सरकार ने भी जानबूझ कर उदासीनता दिखायी है क्यों की ये भी आने वाली चुनावों में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती I

केन्द्र सरकार में एक तरफ़ हमारे गृहमंत्री है जो अनुकम्पा के आधार पर गृह मंत्रालय के सिंहासन पर विराजमान हैंI वर्त्तमान गृहमंत्री को न तो कोई जनमानस का वोट प्राप्त हैं और न ही वे कोई विशेष काबिलियत रखते हैं Iसच्चाई तो यह है की वे सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी के स्वामिभक्त होने का फ़ल खा रहे हैंI

सो पुरानी कहावत है की प्रसूति की पीर वही औरत जानती है जिसने बच्चा जना हो बाँझ औरत इस पीर कों कभी नहीं समझ सकती, पाटिल बाँझ औरत की इस्थिति में हैं इसीलिए सम्बेदनविहिन गृहमंत्री हैं I

दूसरी तरफ़ हमारे प्रधानमंत्री हैं जो की बेदाग छवि वाले और ज्ञानी ब्यक्ति है पर कहीं न कहीं वह भी उतनी सशक्तता से प्रधानमंत्री के पद पर काबिज नहीं हैं क्योंकि वे सोनिया गाँधी के इच्छा से इस पद पर आसीन हैंI नहीं तो हिंसा के आग में झुलस रहे उड़ीसा के हजारों निर्दोष ईसाईयों कों यह इंतज़ार नहीं करना परता की फ्रांस के राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री कों यह याद दिलाएं की उनके आपने देश भारत में हजारों निर्दोष लोगों कों धर्मं के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है और वे (प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह) जल्द से जल्द करवाई करेंI

Thursday, May 29, 2008

सुनोसुनाओ के पाठको का तहे दिल से स्वागत है I